Wednesday, March 16, 2011

हवा के सहारे चांद को छुने का सपना

उसका नाम रमेश राजभर है। वह बक्सर जिले के लालगंज छावनी का निवासी है। उसकी शैक्षणिक योग्यता न के बराबर है। इसके बावजूद उसकी आंखों में एक सपना है। सपना है हवा के सहारे चांद पर जाना। इनका कहना है कि चांद पर जाने में एक स्पेसयान में कितना ईंधन खर्च होता होगा, यदि उनसे आविष्कार को अमल में लाया जाये तो इस प्रकार के किसी ईंधन की आवश्यकता ही नहीं होगी और आदमी केवल हवा के सहारे चांद पर जा सकता है।

दरअसल रमेश ने इंजन का एक माडल विकसित किया है। इस माडल की खासियत यह है कि इसमें हवा के दबाव से इंजन को गतिमान किया जा सकता है। इनके माडल में एक हवा टैंक है, बिल्कुल वैसे ही जैसे बड़े वाहनों में होते हैं और ब्रेक काम करते हैं। इस टैंक से एक पाइप के सहारे हवा निकलने का प्रयास करती है, और जैसे अंतः दाह्य इंजन में धुएं के दबाव के कारण पिस्टन गतिमान हो जाता है। इसी प्रकार रमेश के इंजन में लगा पिस्टन भी गतिमान हो जाता है। अंतर केवल इतना है कि सामान्य स्थितियों मे धुएं को बाहर उत्सर्जित कर दिया जाता है, जबकि रमेश ने निकलने वाली हवा को एक दूसरे पाइप के सहारे फ़िर से वापस टैंक में भेज दिया है। इस प्रकार जितनी हवा टैंक से निकलती है, ठीक उतनी ही हवा टैंक में वापस चली जाती है। इस प्रकार हवा के निकलने और वापस आने के क्रम में पिस्टन अनंतकाल तक चलाया जा सकता है।

रमेश राजभर की खासियत यह है कि उसने ये थ्योरी के बजाय सचमुच का इंजन बनाया है। इस इंजन में डायनेमो लगाकर बिजली पैदा कर रमेश ने बिजली संकट से जुझ रहे बिहार को एक नया संदेश देने का प्रयास किया है। इनका कहना है कि यदि इनके आविष्कार पर अमल किया जाये तो देश में पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जायेगी और इससे पर्यावरण को नुकसान भी नहीं होगा।

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